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    छह किलो के बच्चे में जांच से कालाजार की पहचान, आधुनिक उपचार से 26 दिन बाद घर लौटा श्रेयांश

    -बीमारी की पहचान से उपचार तक एसकेएमसीएच के पीकू वार्ड की चिकित्सकीय टीम ने संभाली चुनौती

    मुजफ्फरपुर। बेलहिया गांव के एक साल के श्रेयांश को करीब एक महीने से रुक-रुक कर बुखार आ रहा था। पिछले पांच-छह दिनों में उसकी आंखों के आसपास सूजन भी आने लगी थी। बच्चा चिड़चिड़ा रहने लगा और बीमारी के बीच उसका वजन घटकर करीब छह किलो रह गया। मां रूप माला के लिए यह समझना मुश्किल था कि आखिर बच्चे को क्या हुआ है। हालत बिगड़ती देख वह उसे लेकर तीन-चार बार एसकेएमसीएच पहुंचीं।

    पीकू वार्ड में चिकित्सकों ने बच्चे की स्थिति को देखते हुए जांच का दायरा बढ़ाया। कालाजार की आरके-39 जांच पॉजिटिव आई। बीमारी को और स्पष्ट करने के लिए आगे की जांचें की गईं। इस दौरान स्पाइनल फ्लूइड का नमूना भी लिया गया। जांच के क्रम में बोन मैरो से जुड़े परीक्षण में एलडी बॉडीज मिलने का उल्लेख भी चिकित्सकीय रिकॉर्ड में दर्ज है। लगातार बुखार, सूजन और कम वजन के बीच इन जांचों ने चिकित्सकों को उपचार की दिशा तय करने में मदद की।

    छह किलो के बच्चे में इलाज भी बड़ी चुनौती:

    एक साल की उम्र और करीब छह किलो वजन के कारण श्रेयांश का उपचार सामान्य मरीजों की तरह नहीं था। चिकित्सकों के सामने बीमारी को नियंत्रित करने के साथ बच्चे की कमजोर स्थिति को संभालने की भी चुनौती थी।

    उसे लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी (एम्बीजोम) नस के रास्ते दी गई। इसके साथ तरल पदार्थ, बुखार नियंत्रित करने की दवा, जिंक, मल्टीविटामिन और जरूरत के अनुसार अन्य सहायक उपचार दिए गए। पीकू वार्ड में उपचार के दौरान बच्चे की स्थिति पर लगातार नजर रखी गई।

    इस मामले की खास बात यह रही कि बीमारी के लक्षण सामान्य बुखार की तरह दिखाई देने के बावजूद चिकित्सकों ने जांच को वहीं नहीं रोका। छोटे बच्चे में आवश्यक नमूने लेकर बीमारी की तह तक पहुंचने की कोशिश की गई और उपलब्ध आधुनिक उपचार को उसकी स्थिति के अनुरूप इस्तेमाल किया गया। यही इस मामले में अपनाए गए चिकित्सकीय नवाचार का महत्वपूर्ण पहलू रहा।

    बीमारी की पहचान से लेकर इलाज तक लगातार निगरानी:

    श्रेयांश के मामले में इलाज केवल दवा देने तक सीमित नहीं रहा। बीमारी की स्थिति, बच्चे का वजन और उपचार के दौरान उसकी प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए चिकित्सकीय टीम ने लगातार निगरानी रखी। करीब 25-26 दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद उसकी हालत में सुधार आया।

    इस दौरान परिवार के लिए भी हर दिन इंतजार और चिंता का था। मां रूप माला लगातार बच्चे के साथ रहीं। पिता मुकेश कुमार का व्यवसाय भी बेटे के अस्पताल में रहने के दौरान करीब 25-26 दिनों तक प्रभावित रहा। परिवार के लिए प्राथमिकता सिर्फ इतनी थी कि बच्चा ठीक होकर घर लौटे।

    मां की कोशिश ने नहीं टूटने दिया इलाज का सिलसिला:

    श्रेयांश की बीमारी के दौरान मां कई बार उसे लेकर अस्पताल पहुंचीं। बीमारी की वजह जल्दी सामने नहीं आने के बावजूद उन्होंने इलाज का सिलसिला नहीं छोड़ा। एसकेएमसीएच पहुंचने के बाद चिकित्सकों ने लक्षणों को देखते हुए जांच आगे बढ़ाई और उपचार शुरू किया।

    करीब दो महीने की बीमारी और अस्पताल में कई दिनों की निगरानी के बाद जब श्रेयांश की हालत सुधरी तो परिवार के लिए यह बड़ी राहत थी। अस्पताल से छुट्टी के समय आगे की दवाओं के साथ 15 दिन बाद फॉलोअप के लिए आने की सलाह भी दी गई।

    अब घर में लौट रही बच्चे की रौनक:

    इलाज के बाद श्रेयांश घर लौट चुका है। उसका नियमित टीकाकरण भी कराया जा रहा है। बीमारी के लंबे दौर ने परिवार को जरूर परेशान किया, लेकिन समय पर अस्पताल पहुंचने और जांच से उपचार तक लगातार चिकित्सकीय देखरेख मिलने से बच्चा अब स्वस्थ होने की राह पर है।

    श्रेयांश की कहानी यह बताती है कि छोटे बच्चों में लंबे समय तक रहने वाला बुखार, वजन कम होना या शरीर में असामान्य सूजन जैसे संकेतों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इस मामले में भी शुरुआत सामान्य बुखार से हुई थी, लेकिन जब लक्षण बने रहे तो जांच को आगे बढ़ाया गया। उपलब्ध जांचों से बीमारी तक पहुंचना और फिर बच्चे की उम्र व स्थिति के अनुरूप उपचार देना ही श्रेयांश के इलाज का अहम हिस्सा रहा।

    बेलहिया का यह बच्चा अब घर पर है। उसके परिवार के लिए 26 दिनों की वह जंग पीछे छूट चुकी है, जिसमें हर दिन का इंतजार इस उम्मीद के साथ बीता कि अगली सुबह बच्चा थोड़ा और बेहतर होगा।

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