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    एसकेएमसीएच में आयोजित हुई जोनल कार्यशाला, बिहार से कालाजार के खात्मे की बनी ठोस रणनीति

    ​-स्वास्थ्य अधिकारियों, डब्ल्यूएचओ प्रतिनिधियों और एसकेएमसीएच के चिकित्सकों ने किया मंथन

    ​-विसरल लेशमेनियासिस के मामलों में 29 प्रतिशत और पीकेडीएल में 37 प्रतिशत की दर्ज की गई कमी

    ​मुजफ्फरपुर। राज्य से कालाजार के पूर्ण उन्मूलन और इसके प्रभावी नियंत्रण को लेकर बुधवार को श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के चिकित्सा शिक्षा इकाई हॉल में एक महत्वपूर्ण जोनल कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला की अध्यक्षता एसकेएमसीएच की प्राचार्या डॉ. विभा कुमारी ने की, जबकि अधीक्षक डॉ. महेश कुमार ने सभा को संबोधित किया. कार्यशाला में स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधियों, जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारियों, तथा एसकेएमसीएच के पीडियाट्रिक, मेडिसिन, माइक्रोबायोलॉजी, पैथोलॉजी, डर्मेटोलॉजी एवं कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने शिरकत की. 

    इसके बाद एसकेएमसीएच के प्राचार्य, अधीक्षक, राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर और सम्बोधन के साथ बैठक के मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डाला.  

    ​बिहार और मुजफ्फरपुर में कालाजार की स्थिति की समीक्षा:

    ​राज्य और जिला प्रोफाइल की समीक्षा के दौरान आयोजित सत्र में विश्व स्वास्थ्य संगठन की जोनल कोऑर्डिनेटर डॉ. माधुरी देवराजु ने बिहार की स्थिति के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि विसरल लेशमेनियासिस की स्थिति में एक साल में 29 प्रतिशत और पोस्ट कालाजार डर्मल लेशमेनियासिस(पीकेडीएल) के मामले में 37 प्रतिशत की कमी आई है. वहीं, वर्ष 2026 में मुजफ्फरपुर में 33 मामले सामने आए हैं, जिसमें 5 ब्लॉकों में 33 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए हैं. विशेषज्ञों ने क्षेत्रवार आकलनों पर चर्चा करते हुए बीमारी की अंतिम कड़ियों को समाप्त करने पर जोर दिया.  

    ​चिकित्सकों के सत्र एवं तकनीकी अनुभव साझा:

    ​दिनभर चली इस कार्यशाला में विभिन्न विभागों के चिकित्सकों ने अपने अनुभव साझा किए. डिप्टी सुपरिटेंडेंट सह एचओडी पीडियाट्रिक विभाग डॉ. गोपाल शंकर साहनी ने अपने प्रेजेंटेशन के माध्यम से वयस्क और बच्चों के कालाजार के लक्षणों में अंतर बताया, लैबोरेटरी फाइंडिंग्स में इस बीमारी को पकड़ने की गूढ़ बातों को समझाया तथा इसके तीन रूपों विसरल लेशमेनियासिस, क्यूटेनियस लेशमेनियासिस और म्यूकोक्यूटेनियस लेशमेनियासिस के बारे में विस्तार से जानकारी दी. सामान्य चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर अमित ने पहले और अब की स्थिति में अंतर और कालाजार में उन्नत हुई उपचार विधि के बारे में बताया. पैथोलॉजी विभाग की तरफ से ट्यूटर डॉ. आरुषि अनुपम ने प्रेजेंटेशन प्रस्तुत किया, वहीं पैथोलॉजी के सहायक प्राध्यापक डॉ. राजविन्द कुमार ने कुछ सवाल भी पूछे और महत्वपूर्ण सुझाव दिए. सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. पूनम, विश्व स्वास्थ्य संगठन के एसएमओ आनंद गौतम सहित अन्य पीजी छात्र और जूनियर चिकित्सक भी मौजूद रहे.  

    ​निगरानी, अनुवर्ती कार्रवाई और समापन:

    ​निगरानी और डोजियर दस्तावेजीकरण पर जोर देते हुए एसकेएमसीएच स्तर पर निगरानी को और अधिक मजबूत करने, मामलों के नियमित फॉलो-अप और डोजियर दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया को दुरुस्त करने पर विशेष चर्चा हुई. इसके बाद खुले सत्र में सभी प्रतिभागियों ने सवाल-जवाब और विचार-विमर्श किया. भोजनावकाश के उपरांत विश्व स्वास्थ्य संगठन, जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ राजेश कुमार और एसकेएमसीएच के समन्वय से कार्य बिंदु तय किए गए और अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यशाला का समापन हुआ.

    मौके पर डीएमओ डॉ राजेश कुमार, वीबीडीसी राजीव कुमार, वीडीसीओ राकेश कुमार रंजन, वीडीसीओ रौशन कुमार, एसकेएमसीएच के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष एवं चिकित्सक, डब्लूएचओ के प्रतिनिधि सहित सहयोगी संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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