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    चमकी पर भारी पड़ रही मुजफ्फरपुर की तैयारी, शून्य मृत्यु दर के साथ लगातार तीसरी बार जीती जंग पूरी

    - चिकित्सीय नवाचार, ब्लॉक स्तरीय परिवहन तंत्र और त्वरित प्राथमिक उपचार के दम पर मुजफ्फरपुर ने पेश किया देश के सामने अनूठा मॉडल

    - शून्य मृत्यु दर का रिकॉर्ड 

    मुजफ्फरपुर। बीते वर्षों तक गर्मी आते ही उत्तर बिहार का मुजफ्फरपुर जिला एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) यानी चमकी बुखार के हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता था, जहां हर साल बड़ी संख्या में मौतें दर्ज होती थीं। लेकिन पिछले तीन वर्षों में मुजफ्फरपुर ने अपनी पूरी स्वास्थ्य रणनीति को बदलकर मौतों के इस सिलसिले पर पूरी तरह रोक लगा दी है। जिला स्वास्थ्य समिति की 9 जून 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, इस सीजन में श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (एसकेएमसीएच) में भर्ती कुल 35 मरीज (20 मुजफ्फरपुर के और 15 पड़ोसी जिलों के) पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। इस शत-प्रतिशत रिकवरी रेट के साथ मुजफ्फरपुर ने लगातार तीसरे साल 'शून्य मृत्यु दर' दर्ज कर यह साबित किया है कि एक सुदृढ़ प्रशासनिक और चिकित्सा तंत्र के बल पर इस जानलेवा बीमारी से होने वाली मौतों को शून्य पर लाया जा सकता है।

    एसकेएमसीएच का विशेष विटामिन प्रोटोकॉल बना सबसे बड़ा लाइफ सेवर:

    मुजफ्फरपुर की इस विशिष्ट सफलता का सबसे बड़ा कारण यहाँ के डॉक्टरों द्वारा विकसित किया गया विशिष्ट वैज्ञानिक प्रोटोकॉल है, जो इसे अन्य क्षेत्रों से अलग करता है। एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. गोपाल शंकर सहनी और उनकी टीम ने लंबे शोध के बाद एक विशेष 'विटामिन कॉम्बिनेशन' (विशिष्ट विटामिनों का मिश्रण) तैयार किया है। अन्य सामान्य उपचारों से अलग, यह फॉर्मूला सीधे बच्चे के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर काम करता है और बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही मस्तिष्क की कोशिकाओं को होने वाले किसी भी तरह के डैमेज को पूरी तरह रोक देता है। चमकी बुखार के कारण शरीर का जो अंदरूनी सिस्टम अचानक ढहने लगता था, उसे यह मिश्रण तुरंत स्थिर कर देता है, जिससे बच्चों की स्थिति वेंटिलेटर तक पहुँचने से पहले ही संभल जाती है। इसी कारण इस साल किसी भी मरीज को बाहर रेफर करने की जरूरत नहीं पड़ी।

    गोल्डन ऑवर' प्रबंधन और ब्लॉक स्तर पर वाहनों की टैगिंग:

    एईएस मामलों में अतीत में अधिकांश मौतें अस्पताल देरी से पहुँचने के कारण होती थीं। मुजफ्फरपुर ने इसी कमजोरी को अपनी रणनीति का मुख्य केंद्र बनाया। प्रशासन ने सुदूर ग्रामीण इलाकों से बच्चों को त्वरित अस्पताल पहुँचाने के लिए प्रखंड स्तर पर गाड़ियों और एम्बुलेंस को सीधे टैग किया, जिनकी 24 घंटे नियंत्रण कक्ष से मॉनिटरिंग की जा रही थी। इसके साथ ही, औराई, मीनापुर, कांटी, मुशहरी, सकरा, कटरा, बोचहां, पारू, कुढ़नी और गायघाट जैसे सभी प्रभावित प्रखंडों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 28 प्रकार की आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं पहले से शत-प्रतिशत उपलब्ध कराई गई थीं। इसके कारण मरीजों को स्थानीय स्तर पर ही शुरुआती उपचार मिल गया और वे 'गोल्डन ऑवर' (संवेदनशील शुरुआती घंटों) के भीतर सुरक्षित रूप से एसकेएमसीएच पहुँच सके।

    संध्या चौपाल से जमीनी स्तर पर सजगता का निर्माण:

    तकनीकी तैयारियों के साथ-साथ मुजफ्फरपुर ने सामुदायिक स्तर पर भी बड़ा बदलाव किया, जिसने मौतों को रोकने में मदद की। स्वास्थ्य विभाग की 'संध्या चौपाल' मुहिम के तहत आशा कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण माताओं को बच्चों को गर्मी में खाली पेट न सुलाने, धूप से बचाने और शरीर में पानी की कमी न होने देने जैसी बुनियादी लेकिन जरूरी जानकारियां दीं। औराई प्रखंड की रीता देवी इसका सीधा उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी चार वर्षीय बेटी सुहानी में लक्षण दिखते ही बिना समय गंवाए टैग किए गए वाहन से सीधे अस्पताल पहुंचाया। इसी मुस्तैदी के सुरक्षा चक्र के कारण मुजफ्फरपुर के अस्पताल के बेड आज खाली हो चुके हैं और वेंटिलेटर रिज़र्व मोड पर हैं। डॉक्टरों ने राहत की सांस ली है, लेकिन उमस भरा मौसम खत्म होने तक स्वास्थ्य तंत्र अलर्ट पर रहेगा।

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