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    कालाजार से जंग जीती, अब दूसरों को कर रहे जागरूक

    •निजी चिकित्सकों से इलाज कराने के बाद जब नहीं मिला आराम, तो सरकारी अस्पताल से मिली जिंदगी

    •घर के आसपास सफाई और मच्छरदानी के उपयोग की दे रहे सलाह

    दरभंगा। बीमारी जब गंभीर हो जाती है तो वह केवल शरीर को नहीं, बल्कि पूरे परिवार की दिनचर्या और मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। कालाजार (विसेरल लीश्मैनियासि) ऐसी ही एक खतरनाक बीमारी है, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है। परंतु सरकारी अस्पतालों की सेवाओं और स्वास्थ्य कर्मियों की तत्परता से अब ऐसे कई मरीज न केवल ठीक हो रहे हैं बल्कि समाज को भी जागरूक कर रहे हैं। ऐसे ही कुशेश्वरस्थान प्रखंड के एक कालाजार चैंपियन हैं  भंडारी कुमार।

    निजी डॉक्टरों से इलाज के बाद भी नहीं मिली राहत:

    भंडारी बताते हैं कि वह  आंध्र प्रदेश में कार्यरत थे। अक्टूबर 2024 में उन्हें लगातार बुखार रहने लगा। शुरू में सामान्य बुखार समझकर अनदेखी की, लेकिन जब स्थिति बिगड़ती गई तो वे अपने गांव लौट आए। उन्होंने कई निजी चिकित्सकों से इलाज कराया और करीब 70 हजार रुपये खर्च किए, लेकिन स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ। लगातार कमजोरी बढ़ती गई, भूख नहीं लगती थी। आखिरकार उन्होंने दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल और फिर कुशेश्वरस्थान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उपचार कराया। जांच में पता चला कि उन्हें कालाजार है।

    सरकारी अस्पताल से मिली नई जिंदगी

    भंडारी ने बताया कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद उन्हें निःशुल्क दवा एवं उपचार प्राप्त हुआ। चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की देखरेख में वह धीरे-धीरे पूरी तरह स्वस्थ हो गए। उन्होंने ईलाज के वक्त को याद करते हुए कहा कि शादी को केवल दो साल हुए थे। इसलिए  परिवार भी बहुत चिंतित था। लेकिन सरकारी अस्पताल के उपचार से उन्हें एक नई जिंदगी मिली। इलाज के बाद सरकार की ओर से 6600 रुपए की प्रोत्साहन राशि भी दी गई। 

    अब बने जागरूकता के दूत:

    स्वस्थ होने के बाद भंडारी ने यह ठाना कि अब वे दूसरों को इस बीमारी से बचने के लिए जागरूक करेंगे। वह गांव के लोगों को मच्छरदानी लगाकर सोने, घर-आंगन की सफाई, और पानी के जमाव को रोकने की सलाह देते हैं। वह कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग और पीरामल हेल्थ टीम लगातार उनका  हालचाल लेने आती थी। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। अब वह खुद दूसरों को समझाते हैं कि कालाजार से डरने की नहीं, बचाव और इलाज की जरूरत है।  

    भंडारी कुमार अब अपने अनुभवों को लोगों तक पहुंचाकर यह संदेश दे रहे हैं कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध है। समय पर जांच और उपचार ही कालाजार से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है। उनकी यह कहानी स्वास्थ्य विभाग के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है, जो दर्शाती है कि कैसे एक मरीज, जागरूकता का “चैंपियन” बनकर दूसरों की जिंदगी बचा सकता है।

    शुरुआती लक्षणों को नहीं करें अनदेखा 

    जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. ए. के. मिश्रा ने बताया कि कालाजार बीमारी लिश्मैनिया डोनोवानी परजीवी से होती है, जो  मनुष्य और बालू मक्खी में जीवित रहता है। यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बालू मक्खी के काटने तक फैल सकती है। 15 दिन से अधिक बुखार रहना, भूख में कमी, पेट का आकार बढ़ना इसके मुख्य लक्षण हैं। जिनके शरीर पर सफेद दाग या गांठ बनती है, वे पीकेडीएल के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे मरीजों की जांच आवश्यक है। विभाग द्वारा प्रभावित गांवों में संदिग्ध रोगियों की खोज, छिड़काव अभियान, और जागरूकता कार्यक्रम लगातार चलाए जा रहे हैं ताकि कालाजार को जड़ से मिटाया जा सके।

    जिले में वर्षवार कालाजार मरीजों की संख्या:

    जिले में वर्ष 

    2023 - वीएल- 11, पकेडीएल -02

    2024 - वीए- 07,पकेडीएल -04

    2025 - वीएल -14,पकेडीएल -02

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