सुरक्षित मातृत्व की नई ईबाबत: दहलीज छोड़ अस्पताल की ओर बढ़ते कदम
-19 पंचायतों में गृह प्रसव 5 प्रतिशत पर सिमटी
-हर ब्लॉक में 3 नए प्रसव केंद्र की हो रही स्थापना
मुजफ्फरपुर। ‘‘ पिछली बार जब बड़ी बेटी हुई थी, तो गांव की दाई ने ही घर के अंधेरे कमरे में प्रसव कराया था। दो दिन तक बुखार नहीं उतरा और बहुत कमजोरी हो गई थी। लेकिन इस बार आशा दीदी ने जिद पकड़ ली। उन्होंने कहा— 'अस्पताल चलो, वहां पैसा भी नहीं लगेगा और जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित रहेंगे। सच कहूं तो अस्पताल में बेड और साफ-सफाई देखकर अब हिम्मत बढ़ गई है।"
गायघाट प्रखंड की बाघाखाल पंचायत की रहने वाली नीलम देवी के ये शब्द मुजफ्फरपुर के बदलते ग्रामीण स्वास्थ्य परिदृश्य की असली कहानी बयां करते हैं। यह केवल किसी एक लाभार्थी की बात नहीं है, बल्कि उस बड़े बदलाव की गूंज है जिसने मुजफ्फरपुर के चार बड़े प्रखंडों को 'मौत के जोखिम' यानी गृह प्रसव के खतरे से बाहर निकाला है।
जिले की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ प्रेरणा सिंह कहती हैं कि मातृ मृत्यु दर को कम करने का एकमात्र रास्ता संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करना है। जब प्रसव किसी दक्ष हाथों और उपकरणों के बीच होता है, तो प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव जैसी जानलेवा स्थितियों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है। मुजफ्फरपुर के चार प्रखंडों में होने वाले घरेलू प्रसव में जो गिरावट आई है, वह इस बात का प्रमाण है कि घर के समीप सरकारी स्वास्थ्य सुविधा की उपलब्धता से लोगों का विश्वास सरकारी अस्पतालों पर बढ़ा है।
46% का आंकड़ा अब इतिहास
कभी गायघाट, औराई, कटरा और कुढ़नी ऐसे क्षेत्र थे, जहां के 19 पंचायतों में 40 प्रतिशत से उपर घरेलू प्रसव होते थे। असुरक्षित प्रसव के कारण जच्चा-बच्चा की जान हमेशा जोखिम में रहती थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की नई रणनीति ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। अब इन इलाकों में गृह प्रसव की दर घटकर मात्र 5 से 10 प्रतिशत रह गई है।
ऐसे मुमकिन हुआ यह बदलाव
जिला कार्यक्रम प्रबंधक रेहान अशरफ इस बदलाव को एक बड़ी सामाजिक और प्रशासनिक जीत के रूप में देखते हैं। वह बताते हैं कि गृह प्रसव की इतनी अधिक दर स्वास्थ्य विभाग के लिए एक गंभीर चुनौती थी, क्योंकि इससे मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर का खतरा हमेशा बना रहता था। इस खाई को पाटने के लिए विभाग ने केवल कागजी दावों पर नहीं, बल्कि धरातल पर तीन मुख्य स्तंभों—जीरो गैप लॉजिस्टिक, आशा कार्यकर्ताओं का सशक्तिकरण और एल-1 प्रसव केंद्रों की सक्रियता—पर काम किया। अब जिले में गृह मुक्त प्रसव को कम करने के लिए हर ब्लॉक में 3 नए एल 1 प्रसव केंद्र की स्थापना की जा रही है।
जीरो गैप लॉजिस्टिक बनी सबसे मजबूत कड़ी
इस सफलता की सबसे मजबूत कड़ी 'जीरो गैप लॉजिस्टिक' व्यवस्था रही है। पहले अक्सर ग्रामीण इस डर से अस्पताल नहीं जाते थे कि वहां दवाएं या जरूरी सामान नहीं मिलेगा और उन्हें बाहर से महंगा खर्च करना पड़ेगा। इस व्यवस्था के तहत हर छोटे केंद्र पर प्रसव से जुड़ी आवश्यक दवाओं और उपकरणों का स्टॉक चौबीसों घंटे सुनिश्चित किया गया, जिससे मरीजों का सरकारी तंत्र पर भरोसा बढ़ा। इसके साथ ही, जिले में 50 ऐसे एल-1 प्रसव केंद्र विकसित किए गए जिन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को सीधे महिलाओं के दरवाजे तक पहुँचा दिया। अब प्रसव की पीड़ा के बीच शहर के चक्कर काटने की मजबूरी खत्म हो गई है, क्योंकि घर के पास ही विशेषज्ञ और सुविधाएं मौजूद हैं।
आशा कार्यकर्ताओं का सशक्तिकरण बना आधार
बुनियादी सुविधाओं से भी बड़ी चुनौती थी पुरानी मान्यताओं और डर को खत्म करना। इस मोर्चे पर आशा कार्यकर्ताओं ने एक 'हेल्थ आर्मी' की तरह काम किया। उन्हें न केवल आधुनिक प्रशिक्षण दिया गया, बल्कि यह भी सिखाया गया कि कैसे वे एक गर्भवती महिला की हमदर्द बनकर उसे अस्पताल तक लाएं। बाघाखाल जैसी पंचायतों में इन कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर काउंसलिंग की।
इस संबंध में आशा कार्यकर्ता सबीना देवी कहती हैं कि शुरुआत में चुनौती सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सोच थी। लोग कहते थे कि 'जब हमारे पुरखे घर में पैदा हुए तो अस्पताल क्यों जाएं?' हमने हर गर्भवती महिला के घर को अपना घर समझा। हम केवल दवा देने नहीं जाते थे, बल्कि उनके साथ बैठकर चूल्हा-चौका की बातें करते हुए उन्हें अस्पताल की सुरक्षा के बारे में समझाते थे। और यह समझाया कि प्रसव के दौरान एक छोटी सी लापरवाही जानलेवा हो सकती है। जब सुविधाओं की उपलब्धता और आशा कार्यकर्ताओं की जिद का मेल हुआ, तो दशकों पुरानी परंपराएं टूटने लगीं।
समुदाय की जीत बन रही गृह मुक्त प्रसव
गृह मुक्त प्रसव पंचायत मुजफ्फरपुर के उन हजारों परिवारों की जीत है, जिन्होंने असुरक्षित प्रसव के अंधेरे को पीछे छोड़ दिया है। गायघाट की बाघाखाल पंचायत इस बदलाव का एक केंद्र बनकर उभरा, जहाँ लाभार्थी और स्वास्थ्यकर्मी मिलकर एक स्वस्थ भविष्य की नींव रख रहे हैं। जिले की इस मॉडल को बिहार के अन्य जिलों के लिए भी एक मिसाल है कि कैसे दृढ़ इच्छाशक्ति और बेहतर प्रबंधन से ग्रामीण स्वास्थ्य के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
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