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    जब 'लीड पेशेंट' बने स्वास्थ्य योद्धा: फाइलेरिया उन्मूलन में गेमचेंजर साबित हो रहे पीएसपी

    -14 प्रखंड/आईयू प्री-टास में हो गए शामिल 

    -स्थानीय योद्धा उन्मूलन की लिख रहे दास्तान

     वैशाली। जिले को 2027 तक फाइलेरिया मुक्त करने के लक्ष्य की दिशा में स्वास्थ्य विभाग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इस वर्ष का सर्वजन दवा सेवन (एमडीए) राउंड एक नई उम्मीद के साथ शुरू हो रहा है क्योंकि जिले के 14 ब्लॉक अब 'प्री-ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे' (प्री-टास) के दौर में पहुंच चुके हैं। विभाग द्वारा जारी हालिया डेटा के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में जिले के फाइलेरिया संक्रमण प्रसार दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। जहाँ पहले यह दर कई क्षेत्रों में खतरनाक स्तर पर थी, वहीं विभाग की सक्रियता से अब यह घटकर कम हो गयी है। 

    इस सफलता के पीछे स्वास्थ्य विभाग की एक सुनियोजित रणनीति रही है। विभाग द्वारा ब्लॉक स्तर पर सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) को विशेष प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे प्रभावित मरीजों के बीच से 'लीड पेशेंट' की पहचान कर सकें। इसके अलावा, विभाग ने एमडीए राउंड के दौरान 'ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन' (डीए) पर जोर दिया, जिसमें स्वास्थ्य कर्मी अपनी मौजूदगी में दवा खिलाते हैं। विभाग की इसी दूरदर्शी सोच और सीएचओ लीड-पेशेंट सपोर्ट प्रोवाइडर (पीएसपी) के जमीनी संघर्ष ने मिलकर जिले को प्री-टास की श्रेणी में लाकर खड़ा किया है।

    केस 1: 

    वैशाली सदर प्रखंड के थाथन पंचायत के कुतुबपुर एचडब्ल्यूसी में नीतू कुमारी एएनएम के रुप में कार्यरत हैं। जनवरी 2024 में वह सीएचओ लीड पीएसपी से जुड़ी। नीतू कुमारी के सामाजिक नेतृत्व ने स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति समुदाय का नजरिया ही बदल दिया है। उनके कार्य की सबसे बड़ी सफलता अस्पताल की चाहरदीवारी से निकलकर सीधे समाज से जुड़ना रहा है। हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर पर सीएचओ ली​ड पीएसपी और अन्य सामुदायिक समूहों के गठन के माध्यम से उन्होंने लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई। रिंकी कुमारी ईमानदारी से स्वीकार करती हैं कि पहले उन्हें स्वयं फाइलेरिया की गहराई का अंदाजा नहीं था,लेकिन पीएसपी की बैठकों और प्रशिक्षण ने उन्हें समाज के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया। आज उनके प्रयासों से करीब चार गांवों के समाज में फाइलेरिया से व्याप्त भ्रांतियां दूर हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप सेंटर पर मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। उन्होंने न केवल फाइलेरिया प्रभावितों को एमएमडीपी किट देकर प्रशिक्षित किया, बल्कि उन्हें सामाजिक सुरक्षा दिलाने के लिए दिव्यांगता प्रमाणपत्र और पेंशन योजनाओं के आवेदन भी करवाए। रिंकी कुमारी का यह सामाजिक दृष्टिकोण स्वास्थ्य सेवा को मात्र उपचार से ऊपर उठाकर 'सामुदायिक सशक्तिकरण' में बदल रहा है।

    केस 2: 

    रश्मि कुमारी थाथन बुजुर्ग आंगनबाड़ी केंद्र-301 पर सेविका है। उन्होंने फाइलेरिया उन्मूलन की दिशा में अद्वितीय समर्पण दिखाते हुए 242 ग्रामीणों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया। रश्मि जी ने यह मुख्य उपलब्धि टीकाकरण सत्रों और क्षेत्र भ्रमण के दौरान व्यक्तिगत संवाद के माध्यम से हासिल की। विशेष बात यह है कि उन्होंने यह सामाजिक जिम्मेदारी अपने घर की कठिन परिस्थितियों के बीच निभाई, जहाँ उनके ससुर रामप्रीत महतो, भरत महतो एवं उनके बड़े भाई सिकंदर महतो बीमारी के कारण उनकी देखभाल पर निर्भर हैं। पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद, एकारा गांव में उनके द्वारा चलाया गया यह जागरूकता अभियान जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सुधार के प्रति उनकी अटूट कर्तव्यनिष्ठा को प्रमाणित करता है।

    इन पीएसपी सदस्यों के समर्पण और स्वास्थ्य विभाग की वैज्ञानिक कार्ययोजना ने यह साबित कर दिया है कि जब सरकारी तंत्र और जनभागीदारी एक साथ मिलते हैं, तो फाइलेरिया जैसी गंभीर बीमारी को भी घुटने टेकने पड़ते हैं। जिले का प्री-टास में प्रवेश करना इसी अटूट तालमेल का सुखद परिणाम है।

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