खून की कमी से लड़ाई में वैशाली की नई पहल, अब दवा के बाद भी होगी निगरानी
-टॉक, टेस्ट और ट्रीट के साथ ट्रैक पर जोर, ताकि उपचार बीच में न छूटे
वैशाली। खून की कमी यानी एनीमिया की पहचान के बाद दवा देना ही पर्याप्त नहीं है। दवा नियमित ली जा रही है या नहीं, लाभार्थी को कोई परेशानी तो नहीं हो रही और हीमोग्लोबिन के स्तर में कितना सुधार हुआ, इसकी जानकारी भी जरूरी है। इसी सोच के साथ वैशाली जिले में एनीमिया मुक्त भारत अभियान के तहत टॉक, टेस्ट और ट्रीट के साथ ट्रैक यानी फॉलोअप पर जोर दिया जा रहा है।
धर्मपुर चौक की ममता कुमारी एनीमिया से प्रभावित महिलाओं में शामिल हैं। उनके उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि एनीमिया से निपटने में जांच और उपचार के साथ सही जानकारी तथा स्वास्थ्यकर्मियों का लगातार संपर्क भी महत्वपूर्ण है। फॉलोअप के जरिए लाभार्थियों को नियमित दवा सेवन के लिए प्रोत्साहित करने और उनकी समस्याओं को समय पर समझने का प्रयास किया जा सकता है।
दवा के बाद भी जारी रहेगा संपर्क:
अभियान के तहत टॉक के माध्यम से एनीमिया के लक्षण, बचाव और संतुलित खानपान की जानकारी दी जाती है। टेस्ट के जरिए हीमोग्लोबिन की जांच कर खून की कमी का पता लगाया जाता है। ट्रीट के तहत जरूरत के अनुसार उपचार और आयरन-फोलिक एसिड की खुराक दी जाती है। इसके बाद ट्रैक के तहत लाभार्थियों से संपर्क बनाए रखने, दवा के नियमित सेवन की जानकारी लेने और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह उपलब्ध कराने पर जोर है।
इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि लाभार्थी उपचार जारी रख रहे हैं या नहीं और उन्हें दवा लेने में किसी तरह की परेशानी तो नहीं हो रही। नियमित फॉलोअप से उपचार की निरंतरता बनाए रखने और जरूरत के अनुसार आगे की जांच कराने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
गर्भवती और धात्री महिलाओं तक पहुंचा अभियान:
अप्रैल से सितंबर 2026 तक की जिला रिपोर्ट के अनुसार, गर्भवती महिलाओं के लिए निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले 98 प्रतिशत उपलब्धि दर्ज की गई। धात्री महिलाओं के मामले में उपलब्धि 101 प्रतिशत रही, जबकि प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं के लिए यह 82 प्रतिशत दर्ज की गई।
बच्चों के बीच भी आयरन-फोलिक एसिड की खुराक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। छह से 59 माह के बच्चों को आयरन-फोलिक एसिड सिरप देने में 53 प्रतिशत उपलब्धि दर्ज हुई। वहीं, पांच से नौ वर्ष के स्कूली बच्चों को गुलाबी आयरन-फोलिक एसिड गोली देने की उपलब्धि 49 प्रतिशत रही।
ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं तक अभियान की पहुंच के साथ बच्चों के बीच भी नियमित खुराक और सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत है। निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले उपलब्धि को आगे बढ़ाने में जागरूकता, समय पर खुराक और लगातार निगरानी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
नियमित दवा सेवन और सही खानपान पर जोर:
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. विशाल प्रकाश के अनुसार, एनीमिया नियंत्रण में पहचान और उपचार के बीच निरंतरता बनाए रखना जरूरी है। लाभार्थियों को यह समझना चाहिए कि आयरन-फोलिक एसिड की खुराक नियमित रूप से लेना क्यों महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्यकर्मियों के संपर्क में रहने से दवा के सेवन में आने वाली समस्याओं की पहचान और समय पर समाधान में मदद मिल सकती है।
जिला सामुदायिक उत्प्रेरक (डीसीएम) निभा रानी सिन्हा ने कहा कि एनीमिया मुक्त भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए लोगों को जागरूक करने के साथ उनके संपर्क में बने रहना भी जरूरी है। फॉलोअप से यह समझने में मदद मिलती है कि लाभार्थी नियमित दवा ले रहे हैं या नहीं और उन्हें किस तरह की सहायता की जरूरत है।
आयरन-फोलिक एसिड की निर्धारित खुराक के साथ संतुलित आहार भी महत्वपूर्ण है। दाल, चना, हरी पत्तेदार सब्जियां और आयरन के अवशोषण में मदद करने वाले विटामिन-सी युक्त खाद्य पदार्थ भोजन में शामिल किए जा सकते हैं। दवा का सेवन स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार करना और जरूरत पड़ने पर जांच कराना भी जरूरी है।
प्रभाव का आकलन हीमोग्लोबिन में सुधार से होगा:
एनीमिया नियंत्रण की इस पहल का वास्तविक प्रभाव केवल दवा वितरण या लाभार्थियों तक पहुंच से नहीं, बल्कि नियमित सेवन, उपचार की निरंतरता और हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार से भी आंका जाएगा। टॉक, टेस्ट और ट्रीट के साथ ट्रैक पर जोर देने का उद्देश्य यही है कि खून की कमी की पहचान होने के बाद उपचार की प्रक्रिया अधूरी न रह जाए।
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