टीबी उन्मूलन के लिए मुजफ्फरपुर में छिड़ी नई जंग: स्वास्थ्य कर्मियों और 'रोगी हितधारक मंच' ने बदला सेवा का स्वरूप
मुज़फ्फरपुर: जिले के स्वास्थ्य परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ फाइलेरिया के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाला 'रोगी हितधारक मंच' अब टीबी उन्मूलन की जटिल चुनौती में स्वास्थ्य विभाग का मजबूत साथी बन गया है। इस बदलाव की इबारत गुरुवार को 'निक्षय दिवस' के अवसर पर जिले के चार प्रमुख ब्लॉक- मड़वन, बोचहाँ, सकरा और मुरौल के विभिन्न आयुष्मान आरोग्य मंदिर में देखने को मिली। यहाँ मड़वन के करजा व भटौना केंद्रों पर सीएचओ अभिलाषा प्रिया, बोचहाँ के बोरवारा व बड़कागांव में सीएचओ प्रियंका कुमारी व एएनएम सीता कुमारी, सकरा के मझौलीया व पीलखी में सीएचओ रानी पासवान, तथा मुरौल के गजपति, मझौलीया व सरफुद्दीनपूर केंद्रों पर सीएचओ ममता व रिंकी कुमारी ने 'रोगी हितधारक मंच' के साथ मिलकर टीबी के संदिग्ध मरीजों की पहचान करने, उन्हें 'निक्षय पोषण योजना' के तहत मिलने वाली 1,000 रुपये की मासिक सहायता राशि के प्रति जागरूक करने और बीमारी के प्रति समाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर कर मरीजों का आत्मविश्वास बढ़ाने का सराहनीय कार्य किया।
फाइलेरिया योद्धाओं का टीबी मरीजों को संबल:
लंबे समय से फाइलेरिया मरीजों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले 'रोगी हितधारक मंच' के सदस्यों के लिए टीबी के क्षेत्र में आना एक सहज और मानवीय विस्तार है। मंच के प्रतिनिधियों का कहना है कि, "हमने बरसों तक फाइलेरिया के मरीजों को समाज के हाशिए पर देखा है, वही अनुभव और मानवीय संवेदना अब हम टीबी के मरीजों के लिए लेकर आए हैं।" उन्होंने मरीजों को स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा दी जाने वाली 1,000 रुपये की राशि महज सरकारी मदद नहीं, बल्कि वह पौष्टिक आहार है, जो मरीज को दवाइयों की कड़वाहट सहने और बीमारी को हराने का हौसला देगा।
एक नई उम्मीद की किरण:
'निक्षय दिवस' के इन आयोजनों के माध्यम से स्वास्थ्य कर्मियों और मंच के कार्यकर्ताओं ने मरीजों को संदेश दिया कि टीबी अब लाइलाज नहीं है, बल्कि सही पोषण और समय पर उपचार से इसे आसानी से हराया जा सकता है। आयुष्मान आरोग्य मंदिर में दिखी यह सक्रियता मुजफ्फरपुर के हजारों मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। टीबी के प्रति इस जमीनी स्तर पर हुई जागरूकता ने न केवल स्वास्थ्य ढांचे को अधिक मानवीय और समावेशी बनाया है, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया है कि बेहतर समन्वय और दृढ़ इच्छाशक्ति से टीबी उन्मूलन का लक्ष्य निश्चित रूप से हासिल किया जा सकता है।
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