सही प्रबंधन से ही डीआर-टीबी का सफल उपचार
-निजी चिकित्सकों के लिए डीआर-टीबी प्रबंधन पर क्षमतावर्धन कार्यशाला आयोजित, विशेषज्ञों ने रखे अपने-अपने विचार
वैशाली। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में ड्रग रेजिस्टेंस ट्यूबरक्लोसिस (डीआर-टीबी) प्रबंधन को सुदृढ़ करने को क्षमता निर्माण कार्यशाला का आयोजन निजी होटल के सभागार में किया गया। यह कार्यक्रम सिविल सर्जन डॉ. श्यामनंदन प्रसाद के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया। इस अवसर पर सिविल सर्जन ने कहा कि क्षय रोग के अधिकांश मरीज प्रारंभ में निजी क्षेत्र में ही उपचार के लिए पहुंचते हैं। इसलिए टीबी और डीआर-टीबी की समय पर पहचान और सही प्रबंधन सुनिश्चित करने में निजी चिकित्सकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ. अजय लाल द्वारा हिंदुस्तान लेटेक्स फैमिली प्लानिंग प्रमोशन ट्रस्ट (एचएलएफपीपीटी) के सहयोग से जिले के निजी चिकित्सकों के साथ क्षमता निर्माण बैठक का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (डीआर-टीबी) के प्रभावी प्रबंधन को सुदृढ़ करना तथा प्रारंभिक जांच, प्री-ट्रीटमेंट मूल्यांकन और मानकीकृत उपचार को बढ़ावा देना था। डॉ. जेड जावेद ने बताया कि सभी संभावित टीबी मरीजों के लिए सीबी नाट या टू नाट जैसी आणविक जांच करवाना अत्यंत आवश्यक है, जिससे दवा प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) का शीघ्र पता लगाया जा सके। यह जांच जिला टीबी केंद्र सहित जिले के स्वास्थ्य केंद्रों पर उपलब्ध है और सभी संदिग्ध मरीजों के लिए निःशुल्क प्रदान की जाती है। वहीं ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी के उपचार से पहले प्री-ट्रीटमेंट इवेल्यूएशन (पीटीई) की महत्ता पर विशेष जोर दिया गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से मरीज की चिकित्सीय स्थिति का आकलन किया जाता है, सह-रोगों की पहचान की जाती है और मरीज के लिए उपयुक्त उपचार पद्धति का चयन किया जाता है, जिससे उपचार के परिणाम बेहतर होते हैं तथा मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। इस दौरान डॉ प्रियंका अग्रवाल ने नेशनल टीबी एलिमिनेशन प्रोग्राम (एनटीईपी) के अंतर्गत उपलब्ध मानकीकृत उपचार पद्धतियों की भी जानकारी दी गई। इनमें बी पालम रेजीमेन (6 माह), शॉर्टर ओरल रेजिमेन (9-11 माह) और लॉन्गर ओरल रेजिमेन (18-20 माह) शामिल हैं। ये सभी दवाएं राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत निःशुल्क तथा गुणवत्ता सुनिश्चित रूप में उपलब्ध कराई जाती हैं।
रोग की समय पर पहचान, सही उपचार व नियमित फॉलो-अप जरूरी है: डॉ. मधुसूदन
कार्यक्रम में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. मधुसूदन ने टीबी उन्मूलन कार्यक्रम को मजबूत करने और राष्ट्रीय उपचार दिशा-निर्देशों के पालन को बढ़ावा देने के लिए निजी चिकित्सकों की ओर से निरंतर सहयोग का आश्वासन दिया। वहीं पूर्व जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ. सीताराम सिंह ने डीआर-टीबी मरीजों के प्रबंधन के अनुभव पर अपने विचार साझा किया। बताया कि समय पर पहचान, सही उपचार, नियमित फॉलो-अप तथा मरीजों की प्रभावी काउंसलिंग डीआर-टीबी के सफल उपचार के लिए अत्यंत आवश्यक है। स्वस्थ रहने के लिए लोगों को जागरूक होना पड़ेगा।
कार्यक्रम के दौरान मिल-जुल कर टीबी सेवाओं को बेहतर बनाने की जतायी प्रतिबद्धता
संचालन एचएलएफपीपीटी के प्रतिनिधि चंदन कुमार , टेक्निकल एक्सपर्ट मेजर डॉ. प्रियंका अग्रवाल, लैब टेक्निकल एक्सपर्ट डॉ. किशोर रेड्डी, राज्य कार्यक्रम प्रबंधक आकाश कुमार एवं डब्ल्यूएचओ कंसल्टेंट डॉ. मेजर अवकाश कुमार सिन्हा ने किया। मेजर डॉ. प्रियंका अग्रवाल ने जिला स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर टीबी सेवाओं को बेहतर बनाने तथा निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ समन्वय को मजबूत करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। मौके पर डॉ. पल्लवी कुमारी, डॉ राजेश कुमार सहित शहर के अन्य गणमान्य चिकित्सक के साथ जिला यक्ष्मा केंद्र के सीनियर डीपीसी राजीव कुमार,एसटीएस रोहित राज,एसटीएलएस संजीव रेड्डी एलटी राजेश प्रसाद यादव, दिलीप कुमार और डॉक्टर फॉर यू के जिला समन्वयक मुकेश कुमार समेत अन्य लोग मौजूद थे।
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